Tuesday, 25 September 2012

पैवंद


( a poem written after the announcement to uproot the subsidy )

अतीत काल से ही
पैवंद पहचान है गरीबी की //

लाखों करोड़ों भारतीय
पैवंद लगे चादर के बल पर जीते हैं
जिसे ओढ़ते वक़्त
टेढा करना पड़ता  है  घुटना //

उन्हें नहीं दिखता
सरकारी पैवंद
जो उन चादरों में लगाए गए हैं
पैवंद हट जाने से
मुहाल हो गया उनका जीना //

सरकार ...
अब अश्वाश्नो  की सुई  से
उसे सिल देगी //

11 comments:

  1. एकदम सच्ची और सार्थक पंक्तियाँ , बबन जी ...

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  2. बेहतरीन और सार्थक रचना..
    :-)

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  3. बबनजी, बहुत सार्थक अभिव्यक्यति।।अपने जीवन की पुराने यादों मे चला गया था, जब मेरी मां कमीज़ पर पैबंद लगा देती थी।।

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  4. वाह, बहुत ही सटीक अभिव्यक्ति....!!

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  5. सटीक एवं सार्थक अभिव्यक्ति.

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  6. बेहद खूबसूरत सच्चाई

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  7. आपने "पैवंद" को सिर्फ कपड़े का हिस्सा नहीं रहने दिया, बल्कि उसे गरीबी, मजबूरी और व्यवस्था का प्रतीक बना दिया। यही बात इस पोस्ट को खास बनाती है। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.

    अधिक जानकारी आपको यहाँ मिल जाएगी - HindiDiscussionForum dot com
    धन्यवाद!

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