Thursday, 7 June 2012

नदी तट पर बैठी एक औरत .....

नदी तट पर बैठी थी
वह औरत .....
रोज देखती थी ...

उसमे गिरते गंदे नालों को
उसे लगता
मैं भी इसी गन्दी नदी की तरह हू

मानव व्यापार करने वालों ने
धकेल दिया मुझे .....
अँधेरी गलियो में
मैं भी नदी की तरह
कितनों से समागम कर
ढ़ोती हू ...उनकी गंदगी

फिर कुछ दिन बाद
एक बाढ़ आयी ....
नदी साफ़ हो गयी

तट पर बैठी औरत सोच रही थी
क्या मेरी जिन्दगी में भी कभी
इसी तरह कोई बाढ़ आएगी ?

10 comments:

  1. फिर कुछ दिन बाद
    एक बाढ़ आयी ....
    नदी साफ़ हो गयी ॥....पर जो कुछ छोड़ गयी उस सफाई के बाद भी ...वो मर्म ज़ख्म बहुत कुछ जीवन को पलट भी गएँ है ..हमेंशान के लिए ...बढ़िया बब्बन जी..nirmal paneri

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  3. बहुत संवेदनशील कविता है,बबन जी.........दिल को छु गयी..........!

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  4. ye kavita or achhi ban sakti thi

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  5. बहुत ही सुंदर काव्य ... स्त्री के मनो विज्ञान को पढने की अच्छी कोसिस

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  6. Arun sathi ... bahi ... aapka aabhar

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  7. सुंदर कटाक्ष और संवेदनशील कविता.

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  8. मैं भी नदी की तरह
    कितनों से समागम कर
    ढ़ोती हू ...उनकी गंदगी ॥
    सन्दर्भ से जुदा चित्र .भाव उद्वेलित करती रचना विवशता का अक्श बुनती रचना औरत की निर उपाय ज़िन्दगी का .

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  9. आपने काफी सुन्दर लिखा है...
    इसी विषय Padhe Betiya, Badhe Betiya, Hindi Article से सम्बंधित मिथिलेश२०२०.कॉम पर लिखा गया लेख अवश्य देखिये!

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