Monday, 4 June 2012

सत्य कब्र से भी निकलकर दौड़ता है

राम थक चूके थे
रावण को बाण मारते -मारते
विभीषण ने बताया
उसकी नाभि में तो अमृत है
राम ने अमृत घट फोड़ दिया
रावण मारा गया ॥

तुम भी थक जाओगे
मेरे दोस्त !!!
सत्य को मारते -मारते
क्योकि ....
सत्य रूपी मानव के
अंग -अंग में अमृत -कलश है ॥

अगर , सत्य को
जिंदा भी दफ़न कर दोगे
मेरे दोस्त ... तो वह
कब्र से निकलकर भी दौड़ने लगेगा ॥

12 comments:

  1. बड़ा ही कमाल का आपने लिखा सर जी ....राम -रावण का उधाह्र्ण देकर ..... बड़े ही आसानी से आपने सत्य को समझा दिया

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  2. निर्विवाद सत्य..

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  3. अद्भुत रचना !!

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  4. बहुत ही सुंदर तरीके सी एक सच्चाई का वर्णन

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  5. sachchi .... me kamal ki rachna...!

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  6. बेहतरीन ....लाजबाब .....आपने शब्द रहित कर दिया ......

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  7. Bahut khub, Ram thak chuke the Ravan ko baan marte mare ...Ati sunder rachna hai . Mubarak

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  8. सत्य प्रखर सूर्य की तरह है,जिसे बादल कुछ देर के लिये ढक सकते हैं पर महज कुछ ही देर के लिये

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  9. आभार
    रत्नेश जी
    अंजनी भाई
    ओम मिश्र जी
    प्रिय दर्शन शर्मा जी

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  10. आप एक सफल कवि हो !

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  11. Sundar ban padi hai rachna, Baban ji... bas ek stanza thoda confusing lag raha hai. Dhrishtata ke liye kshama karenge, main is kavita jagat me anubhavheen hoon...


    तुम भी थक जाओगे
    मेरे दोस्त !!!
    सत्य को मारते -मारते
    क्योकि ....
    सत्य रूपी मानव के
    अंग -अंग में अमृत -कलश है ॥

    Agar satya roopi maanav ke ang ang me kalash hai... tab to thakne ka prashn hi nahi uthta... Agar sujhaav sahi lage to dhyaan dijiyega :)

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