Thursday, 31 May 2012

धूल

अभी कल की ही बात है
थोडा सा रद्दी कपडा
मैंने भिगोया पानी में
पोछ ( साफ़ ) डाले
सारे धूल
जो जमे थे
मेरे घर के
खिडकियों के शीशे पर //
आज धूप भी खिलकर आई थी
कमरे के अंदर //

काश !!!
कितना अच्छा होता
एक भींगे कपडे से
मैं उस धूल को पोछ पाता
जो मैंने
जिंदगी के रेस में
साथ चलने वालों के
चेहरों पर फेकें हैं//

16 comments:

  1. Ati sunder vivaran hai Babban ji.Aise hi likhte rahiye aur sngrah prakashit karein.

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  2. Ramanbhai Rathod.31 May 2012 at 20:33

    Purane kapde se dhool saaf karne ko aap ne jivan ki philosophy ko bakhubi se samzaya hai.Par aisa dimag hone nahi deta dil ke chahne par bhi.

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  3. बब्बन जी आपने क्या बिम्ब प्रस्तुत किये हैं , सराहनीय !
    आशा है आप यहाँ भी पधारेंगें !
    http://dhirendrakasthana.blogspot.in

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  4. ye hai aam jindgi, Bahut hi sundar prastuti bhaiya ji.

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  5. बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
    घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
    लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  6. क्या बात है ,संवेदनशीलता आत्म निरिख्सन का सम्यक भाव सार्थक अभिव्यक्ति मिस्ट.पांडे जी ..

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  7. काश मैं पोछ पाता वो धूल जो जो मैने ज़िन्दगी की रेस में साथ चलने वालों के चेहरे पर फेंकी है.......
    बहुत सुन्दर पन्क्ति सर
    आभार

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  8. आपकी कविता पढ़कर तो यही लगा सर जी ... की गलत करने का मलाल दिल के किसी कोने में छुपा रहता है

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  9. sahi mai gambhir kabita hai.badhaee.mai yehi chahta tha.

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