Saturday, 5 May 2012

भगदड़

भगदड़ क्यों मची  थी 
मुझे नहीं पता 
न जानने  की कोशिस की मैंने 
 लोगों ने कहा -भागो! भागो!
शामिल हो गया मैं भी //

बाद में पता चला 
गिर गया था कोई भूख से 
खून भी निकल रहा था  
भगदड़ इस बात पर मची थी 
किसी ने गोली चलाई है//

धत तेरे  की .....
माँ  ने कितनी बार सिखाया था 
जब कोई कहे 
तुम्हारा कान कोई  कौया  ले गया 
तो बेटा !
कौया को नहीं 
अपने कान को देखना  


28 comments:

  1. जब कोई कहे
    तुम्हारा कान का कौया ले गया
    तो बेटा !
    कौया को नहीं
    अपने कान को देखना ..वाह बबन भाई सुन्दर सन्देश देती बेहद सुन्दर रचना

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  2. भूखा बन्दा गिर गया, खाली पेट धडाम ||

    मरते मरते दस को और मार गया भगदड़ मचाकर -
    भुक्खड़ कहीं का --

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  4. शुक्रिया रविकर जी और सरोज बहन

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  5. सुन्दर सन्देश देती रचना .......

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  6. आज 06/05/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर पर लिंक की गयी हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  7. भूल सुधार ---
    कल 07/05/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर पर लिंक की गयी हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  8. oh---behtarin....sab kan hi dekhte he....aabhar

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  9. अफ्बाहों पर ध्यान न दे ... बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  10. वाह बहुत खूब कहा माँ ने और हम समझे ही नहीं खूबसूरत सन्देश देती सुन्दर रचना |

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  11. सहज भाव से गम्भीर बात कहती सुंदर रचना.

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  12. अपनी इस सुन्दर रचना की चर्चा मंगलवार ८/५/१२/ को चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर देखिये आभार

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  13. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.

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  14. गहन बात सहज तरीके से समझा गई यह रचना...अफवाहों से बचें.

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  15. जब कोई कहे
    तुम्हारा कान कोई कौया ले गया
    तो बेटा !
    कौया को नहीं
    अपने कान को देखना

    ....कितनी सहजता से गहन संदेश देती रचना...बहुत सुन्दर

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  16. bahut sundar sandesh pradhan post .

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  17. सहज भाव से कही गई गंभीर बात सार्थक रचना ....

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  18. बहुत खूब|||
    अच्छा सन्देश देती बेहतरीन रचना....

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  19. बाद में पता चला
    गिर गया था कोई भूख से ...
    बेहद मार्मिक भाव पूर्ण प्रस्तुति....पांडे जी शुभ कामनाएं !!!

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  20. waah Baban bhaai, bahut sundar likhaa hai aapne......hakikat bayaan ki hai ........

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  21. इंसानी जीवन रेखा को बिलकुल सीधे चलना या उस पर कायम रह कर इन्सान कभी सीखना ही नही ...उसको ज़माने में बबूल के पेड़ बोने की और आम खाने की फितरत हमेंसा से रही है ....शास्त्र और विद्वान् हमेंशा शिखा गए आपने जीवन को झोंक कर सिर्फ इन्ही बातों को याद रखने के लिए पर ...इन्सान ...अजीब जानवर निकला इस धरा पर ...:):):)Nirmal Paneri

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  22. बबन भाई अपनी लीक से हट करआपने ये रचना पोस्ट की है . सन्देश के साथ साथ हमारी संवेदनहीनता पर भी कटाक्ष है....सराहनीय

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  23. achhi prastuti baban ji , kuchh spelling error hain shayad kahin kahin ,,ek baar dekh liziye

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  24. vartaman vuvstha par bahut sundar prastuti

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