Tuesday, 25 September 2012

पैवंद


( a poem written after the announcement to uproot the subsidy )

अतीत काल से ही
पैवंद पहचान है गरीबी की //

लाखों करोड़ों भारतीय
पैवंद लगे चादर के बल पर जीते हैं
जिसे ओढ़ते वक़्त
टेढा करना पड़ता  है  घुटना //

उन्हें नहीं दिखता
सरकारी पैवंद
जो उन चादरों में लगाए गए हैं
पैवंद हट जाने से
मुहाल हो गया उनका जीना //

सरकार ...
अब अश्वाश्नो  की सुई  से
उसे सिल देगी //

9 comments:

  1. एकदम सच्ची और सार्थक पंक्तियाँ , बबन जी ...

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  2. बेहतरीन और सार्थक रचना..
    :-)

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  3. बबनजी, बहुत सार्थक अभिव्यक्यति।।अपने जीवन की पुराने यादों मे चला गया था, जब मेरी मां कमीज़ पर पैबंद लगा देती थी।।

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  4. वाह, बहुत ही सटीक अभिव्यक्ति....!!

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  5. सटीक एवं सार्थक अभिव्यक्ति.

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  6. बेहद खूबसूरत सच्चाई

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